कल्प सिद्धि

                                                कल्प सिद्धि

कल्प सिद्धि ; जो आप इच्छा करें या जो कल्पना करें वो सत्य हो जाए l


फोटो गूगल से डाउनलोड किया है, ठीक है l
कॉलेज सुबह लगता है , तो बस से 27-28 की.मी. की यात्रा करके जाना पड़ता है ‌‌l चूँकि सुबह एक ही बस चलती है , भीड़ बहुत रहती है , कभी सीट मिल जाती है , तो कभी नही मिलती ऐसे में खड़े -खड़े ही रास्ता तय करना पड़ता है l बस बहुत ही पुरानी हो चुकी है ( खचाड़ा टुटा फूटा फिर भी बेख़ौफ़ चलती  है ,हैरानी की बात है की उसके पास परमिट भी है , खैर वो मुझे रोज टाइम से कॉलेज पहुचाती है ,मै उसका और उसके मालिक और कर्मचारियों का शुक्रगुजार हु   ) , और हमारे सड़कों के बारे में तो आप जानते ही हैं , बारिश में वो विशाल नदियों का रूप ले लेती है l कही -कही पर तो सड़कों  में इतने गड्ढे और मिट्टियाँ होती है , की आप वहां खेती भी कर सकते हैं l तो सुबह के समय हम कॉलेज वाले बच्चे ही अकेले यात्री नही होते है , कुछ नौकरीपेशा  लोग होते हैं , कुछ अतिथि होते हैं , और कुछ होते है घुमक्कड़ ( हमारी तरह कॉलेज घुमने ही जाते हैं पढ़ते कहां हैं वो तो प्रोफेसर के सामने बैठ कर एक्टिंग करते हैं की आप की सारी बातें हमें समझ आ रही हैं  ), और हमसे और सबसे ज्यादा होतें हैं मजदुर जो कथित स्मार्ट सिटी बिलासपुर में मजदूरी करने जाते है , छोटे -छोटे झोलों में टिफ़िन लिए . उस दिन सुबह जल्दी से तैयार होकर आधा खाना खाकर ( मैं अकसर लेट हो ही जाता हु बस छुटी मतलब क्लास  छुटी और दूसरी बस देर से आती है , और फिर 75% अटेंडेंस, आप समझ सकते हैं ) , मैं जल्दी से बस पकड़ने चला गया , बस आई और मुझे सीट भी मिल गई ( अरे वाह ), फिर 7-8 की.मी. बाद रतनपुर से एक बूढ़े बाबा चढ़े , ज्यादा बूढ़े भी नही थे पर चेहरे के थकान से लग रहा था की ये उम्र अब उनके आराम करने की है , ( पोते -पोतियों के साथ खेलने की ) मैंने  हाँथ में उनके भी टिफिन देखा मै समझ गया ये भी मजदुर ही हैं , कोई सिट खाली नही थी , वो आकार खड़े हो गए एक नजर घुमा कर पुरे बस को देखा ,सिट के लिए ( जब हम बच्चो को खड़े होने में तकलीफ होती है तो वो तो बुजुर्ग थे ) , खैर उनके शक्ल की मायूसी ने मुझे कचोटा या मेरे अन्दर के दया भाव ने मुझसे कहा की इनको खड़े होने में तकलीफ हो रही है , मैंने किसी  बहुत बड़े जादूगर की तरह मन में इच्छा की , कि उनको सीट मिले ,  और थोड़ी  देर बाद  मै खुद अपनी सिट से उठा और उनको बुलाकर वहां बिठा दिया l मेरी कल्प सिद्धि पूरी हुई l पुरे दिन मुस्कुराने के लिए एक वजह मेरे पास थी l 





 कुशल कान्त 

Comments

  1. Bhot khubsurti se tumne is choti si apni real story ko likha, Bhot khub Kusal Kant Bhai...

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  2. ताबड़तोड़ मेरे भाई, इसको मैं आपके नाम लेकर share जरूर करूँगा, badhai मेरे भाई आगे भी लिखो

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